RACIAL DISCRIMINATION – अमेरिका में नस्लीय भेदभाव

सभ्यता के प्रारम्भ से सफल इन्सानों में अपने आपको श्रेष्ठ समझने की अवधारणा पाई जाती है।अपने को श्रेष्ठ व आर्थिक रूप से ताक़तवर मानते हुए ऐसे इंसानों ने अपने फ़ायदे के लिये धर्म, जाति व रंगभेद के आधार पर समाज का वर्गीकरण कर दिया। इस वर्गीकरण में फ़ँसे तमाम वर्ग आर्थिक व सामाजिक समानता के लिये सदियों से आज भी संघर्ष कर रहे हैं और ग़रीबी और बेरोज़गारी के दूश्चक्र में फँस कर दो वक़्त की रोटी के लिये संघर्ष कर रहे हैं। पिछले क़रीब 200 वर्षों से अमेरिकी समाज भी अपने आधुनिक इतिहास के बावजूद पूर्वाग्रहों से ग्रस्त भेदभावपूर्ण मानसिकता से उबर नहीं पाया है और दूसरे देशों से आकर बसे प्रवासी, शरणार्थी व अफ़्रीकी मूल के लोगों को निम्न श्रेणी का मानकर ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ मानने का दंभ दिखा रहा है।

अमेरिका में नागरिक अधिकारों का हनन

अमेरिका में नस्लीय मुद्दा हमेशा से ही संवेदनशील विषय रहा है।अमेरिकी सविंधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं।लेकिन अधिकांश श्वेत अमेरिकियों द्वारा सविंधान की धज्जियाँ उड़ाकर उनके नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों ने अमेरिका के विकास व आधुनिक अमेरिका के निर्माण में भारी योगदान किया है लेकिन उन्हें हमेशा ही दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह देखा जाता है।जहाँ अश्वेत लोगों को ग़रीबी व बेरोज़गारी से जूझना पड़ता है वहीं उनमें शिक्षा का स्तर भी निम्न रहता है।उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानकर उनके अधिकारों व सामाजिक समानता के सिद्धान्तों की खिल्ली उड़ाई जाती है। अश्वेत लोगों की एक छोटी ग़लती उनके लिये बड़ी भारी सिद्ध हो सकती है।मार्टिन लूथर ने अफ़्रीकी-अमेरिकी नागरिकों को समानता का हक़ दिलवाने व उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिये एक लम्बी लड़ाई लड़ी थी।उन्होंने महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए अहिंसात्मक तरीक़े से इस बुराई के ख़िलाफ़ संघर्ष किया।लेकिन कुछ समय बाद उनकी भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। 2009 में बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर अश्वेत समुदाय को उम्मीद की किरण दिखाई दी थी परंतु उनके कार्यकाल में भी नस्लीय दंगे होते रहे।अश्वेत मरते रहे और दोषी पुलिस अधिकारी बरी होते रहे।इन जातीय भेदभाव को ख़त्म करने के लिये बहुत से क़ानून बनाये गए और न्याय प्रणाली में अनेकों संशोधन किये गए परंतु समस्या बद से बदतर होती चली जा रही है।

अश्वेत समुदाय की ख़स्ता हालत

अमेरिका के अधिकांश महानगरों में श्वेत व अश्वेत लोग अलग अलग इलाक़ों में रहते हैं। जहाँ श्वेत बस्तियाँ सभी सुविधाओं से सम्पन्न व साफ़ सुथरी होती हैं वहीं अश्वेतों की बस्तियाँ संकरी व ग़ंदगी से भरी होती हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी व अल्प शिक्षा से ग्रस्त अश्वेतों में अपराध, नशीले पदार्थों के सेवन व बंदूक़ों के प्रयोग की दर श्वेतों से कहीं ज्यादा है। अश्वेत अमेरिकी समाज का मात्र 15% हिस्सा हैं, परन्तु जेलों में इनकी तादाद कुल क़ैदियों के 45% तक है।अशिक्षा व बेरोज़गारी ने इनको अपराध की दलदल में धकेल दिया है।अमेरिकी समाज में अश्वेतों को दुकानों में सहायक, क्लर्क, वेयर हाउस कर्मचारी व घरों में सहायक कर्मचारी जैसे छोटे कामों में लगाया जाता है।उन्हें हेल्थकेयर की सुविधा भी बमुश्किल जारी होती है।इस प्रकार श्वेत-अश्वेत के मध्य खाई और गहरी होती जा रही है।कोरोना वायरस के प्रकोप ने भी अमेरिकी सरकार के समानता के कथन की पोल खोल कर रख दी है।अमेरिका में कोरोना से मरने वाले अमेरिकियों में अधिकांश अश्वेत हैं। लुइसियाना, मिलवाउकी काँउटी, शिकागो, मिशिगन, इलियोनाई आदि शहरों में जहाँ अश्वेतों की आबादी 14% से 32% तक है, वहाँ मरने वाले कुल अमेरिकियों में अश्वेत समुदाय की संख्या 41% से 70% तक है।अश्वेत अमेरिका में बदतर हालात में अपना जीवन यापन कर रहें हैं।इसलिए किसी भी संक्रमण की चपेट में आने के लिये सबसे आसान शिकार हैं।कम आय के कारण भीड़ व घनी बस्तियों में रहना उनकी मजबूरी है।

आख़िर कब मिटेगा यह कलंक

आज अमेरिका में नस्लीय भेदभाव सिर्फ़ किताबों या मीडिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह खेल के मैदानों, सड़कों, कार्यस्थलों व राजनीति में भी व्यापक रूप से फैल गया है।नफ़रत की यह विचारधारा मानव समाज को दो धाराओं में बाँट रही है। रंगभेद के शिकार लोगों में मानसिक रूप से एकाकीपन पैदा हो रहा है और वह समाज में अलग थलग पड़ रहे हैं।इसी से अलगाववाद व भेदभाव की भावना जन्म ले रही है।यही भेदभाव कभी कभी भयानक हिंसा में परिवर्तित हो जाता है।जिसका परिणाम हम आजकल सभी देख रहे हैं। निकट भविष्य में नस्लीय भेदभाव में सुधार आने या परिस्थितियाँ सुधरने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती है।जब तक इन्सान ख़ुद को दूसरों के ऊपर वरीयता देता रहेगा, अपने फ़ायदे के लिये दूसरों को नुक़सान पहुँचाता रहेगा और अपने को बेहतर बताने के लिये दूसरों को नीचे गिराता रहेगा, तब तक सब यूँही चलता रहेगा, चाहे लाख क़ानून बना दिये जायें। धन्यवाद व जय हिन्द

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