OZONE LAYER – ओज़ोन परत

दुनिया भर के इंसानों में एक आदत समान रूप से पायी जाती है की पहले वह किसी भी नई सुविधाजनक वस्तु का जमकर उपयोग व दोहन करेंगे और उसे दुनिया के कोने कोने तक उपलब्ध करवा देंगे। कुछ समय बाद जब इंसान उस वस्तु के मानव जीवन व प्रकृति पर बुरे प्रभाव से परिचित होता है, फिर वह उसको नकारने की कोशिश में लग जाता है और समय पर क़दम न उठाने के कारण उसे प्रकृति के रौद्र रूप का सामना करना पड़ जाता है।ऐसा ही कुछ ओज़ोन परत के साथ हुआ है।दुनिया भर में पिछले 100 वर्षों से सुख सुविधा के ऐसे हज़ारों साधनों का उपयोग किया जा रहा है जिनको बनाने में कई ख़तरनाक गैसों का उपयोग किया जाता है।ये गैसें ओज़ोन परत को जमकर नुक़सान पहुँचा रही हैं जिसके परिणाम आज इंसान व प्रकृति को भुगतने पड़ रहें हैं।हालाँकि 1987 में हुए मौट्रियल समझौते से इन गैसों के उपयोग पर कुछ हद तक रोक लग पायी है लेकिन कुछ विकसित देश ख़ासकर चीन में इसका चोरी छुपे उपयोग अब भी जारी है।

ओज़ोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है।ओज़ोन की यह परत सूर्य से आने वाली ख़तरनाक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है।ओज़ोन गैस का यह झीना सा आवरण सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को 93% से लेकर 99% तक अवशोषित कर लेता है।यह परत मुख्यतः पृथ्वी की सतह से लगभग 10km से लेकर 40km के मध्य स्थित है।ओज़ोन परत की खोज 1913 में फ़्रान्स के दो वैज्ञानिकों फैबरी चार्ल्स व हेनरी वुसोन ने की थी।उन्होंने वायुमंडल की जाँच में यह पाया की 310mm से कम वेवलेंग्थ का कोई भी रेडीएशन सूर्य से पृथ्वी तक नहीं पहुँच पा रहा है।इससे इन वैज्ञानिको ने निष्कर्ष निकाला की कोई ना कोई तत्व ज़रूर पराबैंगनी किरणों को सोख रहा है और उन्हें धरती पर पहुँचने से रोक रहा है।उनकी इस बात को ब्रिटेन के मौसम विज्ञानी जी एम डोबसन ने पूरी तरह से कंफ़र्म कर दिया की यह ओज़ोन ही है जो पृथ्वी को ख़तरनाक पराबैंगनी से बचा रहा है।डोबसन ने एक स्पेक्ट्रोफ़ोटोमीटर विकसित किया जो स्ट्रेटोस्फेरीक ओज़ोन को भूतल से माप सकता था।डोबसन ने ओज़ोन की निगरानी के लिये जो नेटवर्क स्थापित किया था,वह आज भी काम कर रहा है।

पृथ्वी पर लम्बे समय से क्लोरोफ़्लोरोकार्बन( CFC ), हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफ़ार्म व मिथाइल ब्रोमाईड जैसे ख़तरनाक केमिकल्स का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है।इन केमिकल्स का प्रयोग मुख्यतः एयरोसोल स्प्रे, फ़ोम, साल्वेंट व हर तरह के रेफ़्रीजरेंटस बनाने में होता है।इन केमिकल्स के अंधाधुँध प्रयोग से ओज़ोन परत को ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचा व उसमें बड़े बड़े छेद हो गये।जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर स्किन कैन्सर के मामलों में बढ़ोतरी होती गयी और आँखों में मोतियाबिंद के मामले बढ़ने लगे।इसके अलावा भी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी व असमय बुढ़ापा जैसी बीमारियों के लक्षण उभरने लगे।ओज़ोन परत के नुक़सान ने प्रकृति को भी बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचाया है।इसके फलस्वरूप 1987 में लागू मौट्रियल समझौते ने पूरी दुनिया में सीएफ़सी पदार्थ के उत्सर्जन पर रोक लगा दी गयी।वक़्त रहते क़दम उठाने से ओज़ोन की क्षति में गिरावट आयी है।नासा के अनुसार 2004 से अब तक सीएफ़सी पर रोक लगने से ओज़ोन परत के क्षरण में 20% की कमी आयी है।

पूरी दुनिया के एकसाथ मिलकर चलने से ओज़ोन परत का छेद 3% तक छोटा हो चुका है।आज दुनिया में तुरंत प्रभाव से ग्रीन हाउस उत्पादों पर रोक लगाकर प्रयास करने की ज़रूरत है।हमें भी व्यक्तिगत रूप से इसमें सहयोग करना पड़ेगा।इसके लिए सीएफ़सी मार्के वाले उत्पाद ख़रीदने बन्द करने पड़ेंगे, वातानुकूलित संयन्त्रों व रेफ़्रीजरेटरों का प्रयोग सीमित करना पड़ेगा, पारम्परिक रुई के गद्दों व तकियों का चलन बढ़ाना होगा व स्टायरोफ़ोम के बर्तनों की जगह मिट्टी, धातु या काँच के बर्तनों का उपयोग करना पड़ेगा।इन उपायों को चलन में लाकर व समाज में जागरूकता फैलाकर ही हम अपनी धरती को आने वाले ख़तरों से बचा सकते हैं। धन्यवाद व जय हिन्द

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