OLD AGE HOME – अपनों से दूर अपना घर

आज की आधुनिक तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी ने सामाजिक ताने बाने को तहस नहस कर दिया है।पैसा कमाने की अंधी दौड़ ने सामाजिक मान्यताओं व परम्पराओं को पीछे धकेल दिया है।घर परिवार नष्ट होने की कगार पर पहुँच गये हैं।जीवन की इस आपाधापी में घर में मौजूद हमारे बुज़ुर्ग माता पिता सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।रिश्तों के इस नये समायोजन में हमारे वृद्घ माता पिता हमारे परिवार में अब पूरी तरह से फ़िट नहीं बैठ रहे हैं।उन्हें उपेक्षा के साथ साथ क़दम क़दम पर अपमान का घूँट पीना पड़ रहा है।हमारे लिये करियर,सपने व हमारे बच्चे अहम हो गये हैं।दिलों के साथ साथ अब उनके लिये घर में रहने के लिये एक कोना भी उपलब्ध नहीं है।अब उनकी जगह वृद्घ आश्रम में है,जहाँ की सुख सुविधा से भरपूर ज़िन्दगी उन्हें ख़ुश रखेगी,बिना यह जाने की उनकी इच्छा क्या है।जीवन की इस देहरी पर इस तरह से अपमानित होना अत्यन्त लज्जाजनक है।

वृद्ध आश्रम की बेज़ार ज़िन्दगी

वृद्घ आश्रम की सूनी व उदास ज़िन्दगी सिहरन पैदा करने वाली है।तमाम तरह की सुख सुविधाओं के बावजूद बुज़ुर्ग अपनी उदास व सूनी ज़िन्दगी में रंग भरने की पूरी कोशिश करते हैं।यहाँ न सपने हैं न ख़्वाहिशें,ज़िन्दगी के तमाम रिश्ते नातों को भुलाकर घुटन भरी ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैं।प्यार व अपनेपन के दो बोल सुनने को उनके कान तरस जाते हैं।अपने साथियों के साथ रहकर ख़ुश रहने का पूरा दिखावा करते हैं लेकिन अन्दर से टूटा हुआ इंसान हर पल सिसक सिसक कर जीने को मजबूर है।इस हालत में भी वह आपकी सेहत व ख़ुशियों के लिये दुआएँ माँग रहें हैं और जल्द से जल्द अपने मरने की दुआएँ भी।अगर आप उन्हें वृद्घ आश्रम की चारदीवारी में सुखी देखकर अपनी ज़िन्दगी से ख़ुश हैं तो आइये आपका भी स्वागत है। 20-25 साल बाद आप भी इसी तरह सुखी जीवन जी रहे होंगे और आपके बच्चे आपको देखकर ख़ुश होंगे।वक़्त एक बार लौटकर ज़रूर वापिस आता है।

छोटी छोटी ख़ुशियों को तरसते बुज़ुर्ग

बचपन में माँ बाप के साथ रहकर उनको ख़ुश रखने व उनकी हर उम्मीदों पर खरा उतरने के लिये हमारे दिल में अनेकों अरमान होते हैं।लेकिन जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं,ज़िंदगी के नये रंग हमें आकर्षित करते हैं।हमारी व्यस्त ज़िन्दगी हमें पीछे मुड़कर देखने का मौक़ा ही नहीं देती है।हम उनके तमाम संघर्षों को भुला कर अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं।जहाँ माँ बाप प्यार के दो बोल सुनने को तरस जाते हैं वहीं शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम माँ बाप को संभालना बोझ लगने लगता है। जीवन की इस संध्या में,जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है,तब उन्हें हम वृद्घ आश्रम भेज कर अपना कर्तव्य पूरा कर लेना चाहते हैं।हम स्वार्थीपन की तमाम सीमाओं को लाँघ कर निर्लज्ज बन कर मूक दर्शक बने रहते हैं।लेकिन माँ बाप फिर भी हमें ख़ुश रहने की दुआएँ देकर ख़ुशी ख़ुशी वृद्घ आश्रम में रहना मंज़ूर कर लेते हैं।यह इन्सान के नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।

समाज में नैतिक पतन ज़ोरों पर

पश्चिमी समाज का अनुसरण हम अपने मतलब की बातों के लिये ही करते आयें हैं।वहाँ की संस्कृति,शिक्षा व पारिवारिक मूल्यों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।वृद्घ आश्रम अकेले व असहाय वृद्घ जनों की सहायता के लिये बनाये गये थे और हम भरे पूरे परिवार को तोड़कर बुज़ुर्गों को असहाय कर रहे हैं और उन्हें वृद्ध आश्रम भिजवा रहे हैं।पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंग कर हम अपनी संस्कृति को तबाह कर रहे हैं।बुढ़ापा कोई अपराध नहीं हैं।जीवन के इस दौर से प्रायः सभी को गुजरना पड़ता है।जिस देश में माता पिता को देव तुल्य माना जाता हो,वहाँ इस तरह की बेरुख़ी स्तब्ध कर देने वाली है।देश को वृद्ध आश्रम की नहीं,संस्कार पैदा करने वाले शिक्षण संस्थानों की ज़रूरत है।वृद्धों को परिवारों में ही स्थान मिलना चाहिये।उन्हें प्यार व सम्मान की आवश्यकता है।युवा पीढ़ी को उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिये।तभी एक स्वस्थ व कल्याणकारी समाज की स्थापना मुमकिन है।धन्यवाद व जय हिन्द

One Reply to “OLD AGE HOME – अपनों से दूर अपना घर”

  1. kiske mata pita rehte hai vradh ashram main?? aap jaante ho kisi ko??
    mere friends, friend ke friend, relatives, family , cousins ke family me maine nahi dekha aaj tak……. sorry I only want to know that,,,, dont take it like- main aapko bata rahi hu.

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