MAHAVIR JAYANTI – महावीर जयन्ती

दुनिया को सत्य,अहिंसा,समर्पण व त्याग की राह दिखाने वाले परमपूज्य स्वामी महावीर का जन्मोत्सव महावीर जयन्ती के नाम से पूरे भारतवर्ष में बड़ी ही श्रद्धा व उत्साह से मनाया जाता है।इस पवित्र दिन जैन समाज के लोग जैन मंदिरो को विशेष रूप से सजाते है। मंदिरो में विशेष पूजा अर्चना के बाद जैन धर्म के सदगुणो का विस्तार से वर्णन किया जाता है।और अवगुण छोड़ने के लिये प्रार्थना की जाती है।ग़रीबों को कपड़े व खाना वितरित किया जाता है।कई शहरों में जैन धर्म के प्रचार व प्रसार के लिये अहिंसा रैली का आयोजन किया जाता है।अनेक राज्य सरकारें इस विशेष दिन माँस व शराब की दुकाने बंद रखने का निर्देश भी जारी करती हैं।

MAHAVIR JAYANTI -  महावीर जयन्ती

महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व या 615 ईसा पूर्व (दो अलग अलग मत हैं) में हुआ था। जैन धर्म ग्रंथो के अनुसार 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष प्राप्ति के 188 वर्ष बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ।महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ व माता त्रिशला थी।महावीर जब माँ के गर्भ में थे तो माँ त्रिशला ने 14 सपने देखे थे (या 16 ) ज्योतिषों ने जब इनकी व्याख्या की तो बताया की बच्चा या तो सम्राट बनेगा या तीर्थंकर । मूल रूप से वर्धमान नाम से कहलाने वाले स्वामी बचपन से ही साहसी,तेजस्वी व अत्यंत बलशाली थे।इसलिए इनका नाम महावीर पड़ा। ज्योतिषों के कहे अनुसार महावीर की रुचि बचपन से ही जन कल्याण में थी।इसी लोक कल्याण की भावना मन में लिये स्वामी ने शांति व समृद्धि से भरे जीवन को ठोकर मारकर मात्र 30 वर्ष की आयु में एक योगी का जीवन जीने का निर्णय लिया।12 वर्षों की कठोर तपस्या में स्वामी जी ने अनेक मुसीबतों का सामना किया।पर वह अपने पथ पर अडिग रहे।उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।उन्होंने जैन धर्म के तीर्थंकर के रूप में तक़रीबन 30 वर्षों तक ज्ञान बाँटा।और लोगों की सेवा करते करते ही उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

MAHAVIR JAYANTI -  महावीर जयन्ती

भगवान महावीर ने मोक्ष पाने के लिये जीवन में पाँच सिद्धांतो की व्याख्या की है।अगर कोई व्यक्ति इन्हें अपने जीवन में उतार ले तो वह समृद्ध व सुखी जीवन जी सकता है और अपने जीवन में असीम आंतरिक शांति का अनुभव कर सकता है।पहला सिद्धांत है,अहिंसा – भगवान के अनुसार जैन समुदाय को किसी भी परिस्तिथि में हिंसा का समर्थन नहीं करना चाहिए।हिंसा व्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति को ख़त्म कर देती है।भगवान ने ‘अहिंसा परमो धर्म’ सूत्र दिया।अर्थात अहिंसा सभी धर्मों से सर्वोपरि है।किसी से अनजाने में कोई ग़लती हो जाए तो उसे माफ़ कर देना चाहिए।दूसरा सिद्धांत है, सत्य – भगवान महावीर कहते है, हे मनुष्य तुझे सत्य को ही सच्चा तत्व समझना चाहिए।जो बुद्धिमान सत्य के साथ में रहते हैं,वह तैरकर मृत्यु रूपी सागर को पार कर जाते हैं। इसलिए लोगों को हमेशा सत्य बोलना चाहिए।तीसरा सिद्धांत है, अस्तेय – अस्तेय का पालन करने वाले किसी भी रूप में अपने मनमुताबिक़ वस्तु या सेवा ग्रहण नहीं करते हैं।ऐसे ज्ञानी लोग बेहद संयम से रहते हैं और वही ग्रहण करते हैं जो उन्हें प्रदान किया जाता है।चौथा सिद्धांत है,ब्रह्मचर्य – इस महत्वपूर्ण सिद्धांत के लिये जैनों को पवित्रता के ग़ुणो का प्रदर्शन करने व उन्हें अपने जीवन में ढालने की आवश्यकता होती है।जिसके कारण वे कामुक व मन को विचलित करने वाली गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते हैं।पाँचवा और अंतिम सिद्धांत है,अपरिग्रह – यह शिक्षा पिछले सभी सिद्धांतो को एक सूत्र में पिरोती है।इस सिद्धांत का पालन करने से जैन संप्रदाय की चेतना जागृत होती है।और वे सांसारिक व भोग विलास की वस्तुओं का त्याग कर अपने जीवन को अध्यात्म की ओर ले जाते हैं।

MAHAVIR JAYANTI -  महावीर जयन्ती

भगवान महावीर ने संसार को ‘जियो और जीने दो’ का अमूल्य सूत्र दिया।इस सूत्र में जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान महत्व था।इस सूत्र में व्यक्ति दूसरों के लिए भी वही विचार व व्यवहार रखे,जो ख़ुद उस पर भी लागू हों। भगवान सत्य और शांति स्थापित करने के लिए कटिबद्ध थे। भगवान महावीर के इन्ही विचारों को मानकर आज जैन संप्रदाय लोक कल्याण की भावना के लिये प्रयासरत है।आज जैन समाज में दो मत पाए जाते हैं,दिगम्बर व श्वेतांबर। भगवान के जन्म, माँ के सपने व वस्त्र धारण करने जैसे कई बातो पर दो राय हो सकती है किंतु दोनो मत भगवान महावीर के दिखाये हुए रास्ते पर चलने के लिए एकमत से सहमत हैं।और उनके दिखाये गए रास्ते पर चलने के लिये पूरा समाज कटिबद्ध है।

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