HUMANITY – मानवता को समर्पित जीवन

HUMANITY – मानवता को समर्पित जीवन

भगवान द्वारा बनाई गयी अनेक रचनाओं में मानव एक श्रेष्ठ कृति के रूप में धरती पर उतारा गया था।मानव जीवन का उद्देश्य न केवल ख़ुद को एक उत्कृष्ट इन्सान के रूप में स्थापित करना था बल्कि दूसरों के काम में आकर उन्हें हर सम्भव मदद पहुँचाना था।लेकिन जब इन्सान मानवता की ओर रूख न करते हुए दानवता की ओर बढ़ रहा हो और ख़ून के रिश्ते को कलंकित करने पर तुला हो तो उससे सामाजिक रिश्तों को निभाने की अपेक्षा करना बेमानी है।आज निजी स्वार्थों ने इन्सान को अन्धा बना दिया है।मानवीय सवेंदनाएँ दम तोड़ रही हैं।दया, धर्म, ईमानदारी दूर दूर तक नज़र नहीं आ रही है।लेकिन इस दिल तोड़ देने वाले माहौल में भी आशाओं की कुछ कोंपलें फूटी हैं।इंसानियत व मानवता को अपना धर्म मानने वाले गिने-चुने लोगों ने सेवाभाव से इस उम्मीद को ज़िन्दा रखा है कि मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।अगर इन्सान सुख दुख में एक दूसरे के काम न आये तो इन्सान का होना न होना एक समान है।ऐसे लोगों ने मानवता को अपना जीवन समर्पित कर दिया है और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

मानवता का असीमित दायरा

ईश्वर ने संसार ने केवल इन्सान को ही बुद्धि व विवेक दिया है ताकि इन्सान न केवल अपने मानव धर्म का पालन करे बल्कि इस अल्पकालिक जीवन को अपने अच्छे कर्मों से महका कर सार्थक सिद्ध करे।इन्सान की सुन्दरता उसकी देह से नहीं अपितु उसके सुन्दर कर्मों से होती है और सुन्दर कर्मों को मानवता का धर्म ही परिभाषित कर सकता है।जब इन्सान मानवता को खो देता है तो वह पशुवत सरीखा व्यवहार करने लगता है।मानवता ही इन्सान को सृष्टि के अन्य जीवों से अलग करती है और सभी जीवों में श्रेष्ठता प्रदान करती है।इस धरती के प्रत्येक कण को मानवता की ज़रूरत है।मानवता का दायरा केवल इन्सान तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रकृति के सभी कणों ज़मीन, पहाड़, जंगल, पशु-पक्षी व वातावरण से भी जुड़ा हुआ है।इनके प्रति सच्ची निष्ठा व लगाव दिखाकर इनका बचाव किया जा सकता है।यह प्रकृति के अभिन्न अंग ही हमारे जीवन को निरन्तर गतिमान व ऊर्जा से भरे बनाये रखते हैं।इनके प्रति मानवता दिखाना प्रकृति को अपने में आत्मसात करने सरीखा है और प्रकृति इस उपकार का बदला भर भर के लौटाती है।

मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं

मानवता की रक्षा, विकास व सेवा के लिये हर व्यक्ति को हमेशा जागरुक व तैयार रहना चाहिये।मानव जीवन का उद्देश्य ही तन मन धन से दूसरों की मदद करना होना चाहिये।जीवन में अगर हम प्रेम, दया, करुणा, क्षमा व सत्यता का समावेश कर लें तो जीवन को पशुता, बर्बरता व अहंकार से मुक्त किया जा सकता है।समानता के अधिकार को हम अपने व्यवहार में ढालकर किसी भी व्यक्ति को अपना बना सकते हैं।किसी भी वस्तु या सेवा को पाने के स्थान पर हम देने का साहस दिखाएँ तो न केवल मन को असीम शान्ति की प्राप्ति होती है बल्कि एक सदभावना उत्पन्न होती है और आज विभिन्न धर्मों, सम्प्रदाय, व समाज को सदभावना की सबसे ज्यादा ज़रूरत है।जीवन में मनुष्य अपने अच्छे व्यवहार के कारण ही अन्य मनुष्यों व समाज को आकर्षित कर सकता है।मनुष्य का व्यवहार उदारता, प्रेम, मित्रता व सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिये।ऐसा व्यवहार समाज में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर समाज के सभी वर्गों में आत्मीयता की भावना पैदा करता है और यही आत्मीयता मानवता की ओर बढ़ने की पहली सीढ़ी है।

मानवता की ओर बढ़ाने होंगे क़दम

भगवान द्वारा रचित इस मानव जीवन को सार्थक सिद्ध करने के लिये जीवन को उद्देश्यों व संभावनाओं से भरपूर बनाना होगा।वह जीवन जो सच्चरित्र व सदाचारी हो व जिसके जीने का उद्देश्य ही मानव कल्याण की कामना हो।एक मानव के जीवन में जब तक मानवीय गुणों का समावेश नहीं होगा और वह दूसरों के काम नहीं आयेगा तो ऐसे जीवन की कामना ही व्यर्थ है।जीवन का महत्व बताने वाले नियमों में नैतिकता सबसे प्रमुख स्थान रखती है।मानव जीवन में जितने भी आदर्श व्यवहार व व्यक्तित्व के प्रभाव वाले गुण है, सभी नैतिकता के मापदण्ड पर खरे उतरने चाहिये।नैतिकता ही इन्सान को जीवन के शाश्वत मूल्यों से अवगत करा कर उच्चतम स्थान दिलाती है और श्रेष्ठ बनाती है।अतः जीवन के अन्तिम क्षण तक नैतिकता का दामन पकड़े रहें और श्रेष्ठ इन्सान बनने का प्रयत्न करते रहें। धन्यवाद व जयहिन्द

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