DR.BHIM RAO AMBEDKAR – डॉ.भीमराव अम्बेडकर

हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा।कोई भी राजनैतिक शक्ति हमारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती है।हमारा कल्याण हमारे समाज के हाथों में ही निहित है।हमें अपने रहने का तरीक़ा बदलना होगा।उच्च शिक्षा प्राप्त करनी होगी।हमें अपनी हीन भावना को त्यागकर अपने अंदर दैविय शक्ति स्थापित करनी होगी,तभी हम लड़कर कामयाब हो सकते हैं। यह अमर कथन बाबा साहब अम्बेडकर के हैं जो उन्होंने 1930 में समाज के पिछड़े व शोषित वर्ग के प्रथम सम्मेलन में कहे थे।युवा आयु में ही दलित व शोषित समाज को ऊपर उठाने व अछूतों से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन करने वाले बाबा साहब की जीवनी प्रेरित करने वाली है।

Duniyabharse bhim rao

14 अप्रेल 1891 को मध्यप्रदेश के महू शहर में जन्में बाबा साहब हिंदू महार जाति से सम्बंध रखते थे।जोकि अछूत मानी जाती थी।इस कारण सामाजिक व आर्थिक भेदभाव की नींव बचपन से ही पढ़ गयी थी।जब वे चौथी कक्षा में अंग्रेज़ी में उत्तीर्ण हुए तो यह अछूतों में असामान्य बात थी।उनकी इस सफलता का जश्न पूरे समाज द्वारा मनाया गया।इस समारोह में उन्हें दादा जी के मित्र ने ‘बुद्ध की जीवनी’ नामक किताब भेंट की गयी।जो स्वयं दादा जी के मित्र द्वारा ही लिखी गयी थी।तब अम्बेडकर ने पहली बार गौतम बुद्ध व बोद्ध धर्म को जाना और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।और पूरी उम्र बोद्ध धर्म के अनुयायी बने रहे। 1897 में अम्बेडकर का परिवार मुंबई चला गया।और आगे की शिक्षा उन्होंने वहीं से हासिल की। 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की।और अपने महार समाज में इस स्तर की परीक्षा पास करने वाले पहले व्यक्ति बने। 1912 में बाम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की।अति मेधावी छात्र होने के कारण उन्हें लंदन स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय ने स्नातकोतर परीक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की।जीवन का यह दौर अम्बेडकर के लिये नई उम्मीदें लेकर आया। मेधावी छात्र होने के कारण उन्होंने लंदन व अमेरिका में वक़्त से पहले,मेहनत कर बहुत सी डिग्रियाँ हासिल की। 1922 में उन्हें बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त हुई। 1923 में उन्हें अर्थशास्त्र में डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि प्राप्त हुई।इसी वर्ष तमाम डिग्रियाँ व अनुभव लिये डा. साहब भारत लौट आये।

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डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि छुआछूत ग़ुलामी से बढ़कर है।और पीड़ित व्यक्ति को निकृष्टतम अहसास कराता है।यह एक समाज विरोधी,देश विरोधी व वमनस्य पैदा करने वाली सोच है।डॉ. साहब ने छुआछूत के विरुद्ध एक व्यापक व सक्रिय आंदोलन चलाने का निर्णय लिया।उन्होंने सामाजिक आंदोलनों व सत्याग्रह के द्वारा एक मुहिम छेड़ दी। उन्होंने पिछड़े व शोषित समाज के कल्याण के लिये कई जगह आंदोलन किया।सार्वजनिक पेयजल के संसाधनों को समाज के सभी वर्गों को समान रूप से उपलब्ध करवाने व मंदिरों में अछूत समाज को प्रवेश दिलाने के लिए उन्होंने उच्च समाज के ठेकेदारों के साथ भरपूर संघर्ष किया। 1927 में उन्होंने हिंदू ग्रन्थ मनुस्मृति की सार्वजनिक रूप से निंदा की व हज़ारों अनुयायियों की उपस्थिति में मनुस्मृति की प्रतियों को जलाकर अपना रोष प्रकट किया।सनद रहे कि मनुस्मृति में कई जगह जातीय भेदभाव व छुआछूत का समर्थन किया गया है। 1930 तक बाबा साहब पिछड़े व दलित समाज के अगुआ के रूप में उभर रहे थे। बाबा साहब ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस,महात्मा गांधी व सभी राजनैतिक दलों की जातिप्रथा को लेकर आलोचना की और उन्हें अछूत समाज को एक दयापात्र के रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाया।बाबा साहब ने अंग्रेज़ सरकार को भी आड़े हाथों लिया व उन्हें भी समाज को नुक़सान पहुँचाने का दोषी बताया।बाबा साहब के निरन्तर संघर्ष ने दलित व पिछड़े वर्ग को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।अब यह पिछड़ा वर्ग भारत की राजनैतिक धारा में महत्वपूर्ण स्थान की माँग करने लगा था।

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आख़िरकार 15 अगस्त 1947 को देश को आज़ादी मिली और उच्च शिक्षित व पिछड़े वर्ग के मसीहा बाबा साहब अम्बेडकर को स्वतन्त्र भारत का प्रथम क़ानून मंत्री पद प्रदान किया गया।इस पद तक वो अपनी मेहनत,लगन व क़ानून की बारीकियों को जानने के कारण ही पहुँचे थे।उनकी इसी क़ाबलियत को देखते हुए उन्हें 29 अगस्त 1947 को भारत की संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।उन्हें भारत के संविधान का फ़ाइनल ड्राफ़्ट तैयार करने में तकरीबन 3 वर्ष का समय लगा।सन 1951 में उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर हिंदू संहिता विधेयक को संसद में पास करवाने का प्रयास किया और पारित न होने होने पर क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया। 1952 में उन्हें राज्य सभा के लिये मनोनीत किया गया।और अपनी मृत्यु तक इस सदन के सदस्य बने रहे। 6 दिसम्बर 1956 को बाबा साहब का देहांत हो गया।सरकार ने बाबा साहब को 1990 में मरणोंपरांत भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा।राष्ट्र हमेशा उन्हें भारतीय सविंधान के शिल्पी व पिछड़े वर्ग के मसीहा के रूप में याद करेगा और उनकी सेवाओं के लिये हमेशा कृतज्ञ रहेगा।

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