DOMESTIC VIOLENCE – घरेलू हिंसा की भयानकता

सदियों से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में शारीरिक व भावनात्मक रूप से कमज़ोर माना जाता है।इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का दर्जा पुरुषों से कमतर व निम्न श्रेणी का माना जाता है।इसी मूर्खतापूर्ण मानसिकता ने घरेलू हिंसा को बढ़ावा दिया है। घरेलू हिंसा में महिलाओं के शारीरिक शोषण के साथ उनका भावनात्मक शोषण, मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार व आर्थिक शोषण भी जमकर किया जाता है।जब दो रिश्तों के बीच प्यार,सम्मान व सहानुभूति की भावना समाप्त होकर नफ़रत में बदल जाती है तो उसका परिणाम घरेलू हिंसा के रूप में होता है।घरेलू हिंसा दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर अति विकसित देशों में समान रूप से प्रचलित है।शायद महिलाओं को प्रताड़ित करने में कोई देश पीछे नहीं रहना चाहता है।

महिलाओं के प्रति समाज की पक्षपातपूर्ण नीति

घरेलू हिंसा की जड़ें हमारे समाज व परिवारों में बहुत गहराई तक जमीं हुई हैं।पुरुष प्रधान सोच व श्रेष्ठ होने का दंभ परिवार से ही विरासत में मिलता है। इसी सोच ने महिलाओं पर हिंसा को बढ़ावा दिया है।घरेलू हिंसा को परिवारों में हमेशा से ही नज़रअन्दाज़ किया जाता रहा है और समाज के डर से भी इसे छुपा लिया जाता है। ज्यादातर महिलायें बदनामी के डर से या अपना रिश्ता बचाने के दबाव में इसे चुपचाप सहन कर जाती हैं।घरेलू हिंसा के मामले में परिवार, समाज व क़ानून की मानसिकता हमेशा से पक्षपातपूर्ण व समझौतावादी रही है।किसी भी प्रकरण में महिलाओं पर ही दबाव डालकर उसे समझौते पर मजबूर किया जाता है।पुलिस व अदालतें भी महिलाओं को क़ानूनी उपायों से बचाकर अक्सर मामले को मिल बैठ कर सुलझा लेने का सुझाव देती हैं।इसी मानसिकता ने महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा है और उनका घरेलू हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाना पुरुष प्रधान समाज के अधिकारों पर चोट माना जाता है।

घरेलू हिंसा का महिलाओं पर प्रभाव

महिलाओं पर ज़ोर आज़माइश करने वाले कोई अजनबी नहीं बल्कि हमारे अपने होते हैं।हमारे आसपास रहने वाले व हमें प्यार करने वाले।यही बात तन से अधिक मन को चोट पहुँचाती है और महिलाओं को अन्दर तक तोड़ कर रख देती है।इसके शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक दुष्प्रभाव सामने आते हैं।डर के माहौल व भविष्य की चिंताओं से पीड़ित महिलाओं के काम करने व निर्णय लेने की क्षमता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।उनकी कार्यक्षमता घटने लगती है।इस माहौल में वह इस क़दर भयभीत हो जाती हैं की उनके मानसिक रोगी बनने का भी डर बना रहता है।जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या जैसे बुरे ख़याल भी मन में आने लगते हैं।घरेलू हिंसा में आर्थिक पक्ष भी महिलाओं के पैरों में बेड़ी डाले रखता है।ऐसी महिलायें जो कभी घर की चारदीवारी से बाहर नहीं निकली हैं, उनके लिये नये सिरे से अपना करियर बनाना व अकेले रहकर समाज से लड़ना बहुत मुश्किल प्रतीत होता है।अधिकांश महिलायें इससे डरकर समझौतवादी रूख अपनाती हैं और जीवन भर इस आशा से परिवार में ही संघर्ष करती हैं की कभी तो परिस्थितियों में सुधार आयेगा।लेकिन संघर्षशील महिलायें निकल पड़ती है एक नई राह पर,अंजाम से बेख़बर व सुनहरे भविष्य की तलाश में।

रूक जाना नहीं,तू कभी हार के

अगर आप अपने रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं तो उसे छोड़ देना ही बेहतर है।उसे बार बार समय देना व समझौते के लिये गुज़ारिश करना आपको इतना गहरा ज़ख़्म दे सकता है की आपकी आने वाली ज़िन्दगी नरक बन कर रह सकती है।यदि आपके ख़िलाफ़ लगातार शारीरिक व मानसिक हमले होते रहेंगे तो उसका बचाव करना भी आपका हक़ है।दुर्व्यवहार एक सीमा तक ही सहन किया जा सकता है।कभी-कभी यह अपनी तमाम सीमाओं को लाँघकर आपको जीवन के उस चौराहे पर खड़ा कर देता है जहाँ आपको आगे बढ़ने व पीछे लौटने की राह चुननी पड़ती है।फ़ैसला आपका ख़ुद करना पड़ेगा।एक बेहतर भविष्य की आस या टूटे सपने व समझौतवादी रूख अपनाकर वापिस उसी जीवन में लौट जाना।अपने रिश्ते को बचाने के लिये अपने आपको तिल-तिलकर मरने देना कहाँ तक उचित है।आगे बढ़िये और अपनी राह ख़ुद चुनिए।कुछ मुश्किलें आयेंगी,समाज में भी तिरस्कार होगा लेकिन समय सब घाव भर देता है।एक बेहतर भविष्य आपका इन्तज़ार कर रहा है बस आगे बढ़कर क़दम उठाने की ज़रूरत है। धन्यवाद व जय हिन्द

2 Replies to “DOMESTIC VIOLENCE – घरेलू हिंसा की भयानकता”

  1. bahut achha likha hai is aap ne is masle ke upar.
    agar aap kisi rishte se tamam good-faith koshishon ke bawjood khush nahi hai aur nibha nahi pa rahe hai to aise rishto ko ba-khushi aur ba-adab chhor dene mein hi behtari hai. is se shayad domestic violence ke cases mein kuchh kami aa jaaye.

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