DIVORCE – तलाक़ के बाद ज़िन्दगी !

DIVORCE – तलाक़ के बाद ज़िन्दगी !

किसी भी रिश्ते का ख़त्म होना बड़ा ही तकलीफ़देह होता है ख़ासतौर पर,अगर वह रिश्ता जीवन साथी से जुड़ा हुआ हो।जीवन में कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं कि न चाहते हुए भी कई कड़े फ़ैसले लेने पड़ते हैं।ऐसे फ़ैसले,भावनात्मक रूप से जुड़े रिश्तों को तोड़ कर रख देते हैं और हमें बहुत मानसिक कष्ट पहुँचाते हैं।हम ख़ुद को अकेला व टूटा हुआ महसूस करते हैं।समाज के सभी बन्धनों से हमारा विश्वास उठने लगता है।लेकिन वक़्त सब घाव भर देता है।धीरे धीरे हम ख़ुद को सम्भालना शुरू करते हैं तो पहले से अधिक सक्षम महसूस करते हैं।अपने आपको आर्थिक व मानसिक तौर पर मज़बूत बनाए रखना व भविष्य की चुनौतियों से बचाकर रखना किसी भी इन्सान के लिये बड़ा मुश्किल होता है लेकिन जीवन में सही समय पर उचित क़दम उठाकर ही हम ज़िन्दगी को फिर से गुलज़ार कर सकते हैं।

अपना करियर ख़ुद बनाइये

तलाक़ से पूर्व अगर आप आर्थिक रूप से अपने जीवन साथी पर आश्रित थे तो आप अपने होसलों को नई उड़ान दीजिये।आप जिस क्षेत्र में अपने आपको अच्छा महसूस करते हैं उसी में अपना करियर तलाशें।जीवन में किसी भी उम्र व मुक़ाम पर हमेशा कुछ नया किया जा सकता है बशर्ते आप में हौसला व हिम्मत बरक़रार रहे।इसके लिये डरने या शर्मिंदगी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है,बस अपने आपको मज़बूत बनाना होगा।सफलता एक दिन निश्चित रूप से आपके क़दम चूमेंगी।आपका जीवन नये अवसरों के लिये खुला हुआ है।इसे बड़ी ही मेहनत व लगन से आगे बढ़ाये।परिस्थितियों से भागकर आप सिर्फ़ अपना ही नुक़सान करेंगे।आपकी मेहनत व जीवन जीने के नये नज़रिये से ज़िन्दगी एक बार फिर करवट लेगी।

बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ मत करिये

तलाक़ का सबसे बुरा प्रभाव दम्पति के बच्चों पर पड़ता है।इससे उनका मानसिक विकास अवरुद्ध हो सकता है।बालमन बड़ा ही कोमल व संवेदनशील होता है।छोटी छोटी बातें उन पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं।बच्चे समाज की नज़रों में ख़ुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं।तलाक़ लेने से पूर्व बच्चों के भविष्य पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव का गम्भीरता पूर्वक आकलन होना चाहिये।दोनों पक्षों का बच्चों पर समान अधिकार होता है,यही बात बच्चों के दिल व दिमाग़ में अच्छी तरह से बिठा देनी चाहिये।भविष्य में बच्चों की ज़रूरतें पूरी करने के लिये दोनों पक्षों का एक दूसरे के सम्पर्क में रहना जरुरी है।बच्चों के साथ दोनो पक्षों का जुड़े रहना उसे मानसिक संबल प्रदान करता है।अपनी तनावपूर्ण ज़िन्दगी से बच्चों को आप जितना बचाकर रखेंगे,यह आपके व बच्चों के भविष्य के लिये उतना ही अच्छा होगा।

भीड़ में अपनों को पहचानिये

भावनात्मक रूप से टूटे इंसान को सबसे ज्यादा ज़रूरत अपनेपन की होती है।इस बुरे वक़्त में ही हमारे अपनों की पहचान होती है।जिनमें क़रीबी रिश्तेदार व दोस्त शामिल होते हैं।इनका सहारा व समर्थन पाकर हम फिर से अपने पैरों पर खड़े होकर संघर्ष करने की स्थिति में पहुँच सकते हैं।ऐसे लोग न केवल सुख दुख में हमारे साथ होते हैं बल्कि जीवन के हर मोड़ पर हमें सहारा व हौसला प्रदान करते हैं।इन्ही से बात करके व अपने सुख दुख बाँटकर हमें ख़ुशी मिलती हैं।जीवन की किसी भी परिस्थिति में ऐसे लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिये।यही अपने लोग हमारे जीने का आधार होते हैं।

आख़िर तलाक़ से कैसे बचा जाये

समाज में जिस तेज़ी से तलाक़ बढ़ रहे हैं उस पर रोक लगाना अति अनिवार्य है।बढ़ती महत्वकांक्षा व तनावपूर्ण पेशेवर ज़िंदगी ने मनुष्य को आत्मकेंद्रित व स्वार्थी बना दिया है।अधिकांश दम्पति अपने आपसी सम्बंधो की ग़रमाहट को भूलकर एक अनजानी ख़ुशी की तलाश में भटक रहे हैं।विचारों का न मिलना व जीवन में छोटी छोटी बहस कब बड़ा रूप धारण कर लेती है,पता ही नहीं चलता।शादी को अटूट बनाने के लिये जिस धर्य व सहनशक्ति की ज़रूरत होती है,वह आधुनिक समाज में धीरे धीरे लुप्त हो रही है।तलाक़ बहुत सोच समझ कर लिया जाने वाला निर्णय है।तलाक़ से केवल दो परिवार ही नहीं अपितु पूरा समाज प्रभावित होता है।दोनो पक्षों को अपनी सहभागिता को इस हद तक बढ़ाना चाहिये जिसमें एक दूसरे के प्रति विश्वास, प्रेम व समर्पण की भावना का समावेश हो, यही सुखी विवाहित जीवन का आधार है। धन्यवाद व जय हिन्द

This Post Has One Comment

  1. PERMILA RANI

    विश्वास और प्रेम होने पर ही पति-पत्नी अपने घर संसार को स्वर्ग सा सुंदर बना पाते हैं न होने पर नरक सा घिनौना। लेते हैं तलाक का सहारा। बिखर जाता है बच्चों का मासूम बचपन। यह आज के जीवन की त्रासदी है।

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