DEDICATION – समर्पण की शक्ति

DEDICATION – समर्पण की शक्ति

समर्पण का अर्थ है अटूट श्रद्धा, अपने आप को सम्पूर्ण रूप से बिना कोई तर्क वितर्क किये किसी को सौंप देना,जिस पर आपको पूर्ण विश्वास,श्रद्धा व आस्था है।समर्पण में किसी प्रकार के संदेह या तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती है।समर्पण किसी इंसान,अपने प्रिय भगवान या सम्पूर्ण मानव कल्याण के लिये किया जा सकता है।समर्पण में व्यक्ति अपने आप को पूर्णरूपेण रूप से समर्पित कर देता है।समर्पण में व्यक्ति को जिस असीम शान्ति व सुख की प्राप्ति होती है,वह कल्पना से परे है।सच्चा समर्पण दिखावे से कोसो दूर होता है।जहाँ छल कपट,दिखावा या स्वयंहित छुपा हुआ है,वह समर्पण न होकर समझौता बन जाता है।

समर्पण की शक्ति

अध्यात्म की राह पर समर्पित जीवन

समर्पण आध्यात्मिक पथ पर सफलता पाने का एकमात्र व सबसे उत्तम साधन है।स्वयं को अपने गुरु या इष्ट देवता को समर्पित कर उसी की सेवा में लीन हो जाना व किसी भी परिस्थिति को स्वीकार करना ही समर्पण है।समर्पण की राह पर चलते हुए हज़ारों कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, दुःख सहने पड़ेंगे, लेकिन यही सच्चा व उत्कृष्ट मार्ग है जो हमें गुरु या भगवान की भक्ति में लीन रखेगा।सच्चे मन से,पूरे दृढ़ निश्चय के साथ अपने आपको भगवान को समर्पित करना ही श्रेष्ठ श्रद्धा है।अगर एक बार ईश्वर ने आपका हाथ थाम लिया तो वह कभी जीवन की मझदार में आपको अकेला नहीं छोड़ता है और निश्चित पथ पर पहुँचा कर ही दम लेता है।यही सच्ची श्रद्धा व समर्पण की ताक़त है।वह कभी हमें गिरने नहीं देता है और जीवन की हर परिस्थिति में संभालें व थामे रखता है।

समर्पण की शक्ति

सच्चे प्यार में समर्पित जीवन

समर्पण सच्चे प्यार में भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अपने भगवान को सर्वस्व समर्पित करने में है।समर्पण का अर्थ ही अपनी चाहतें,आकांक्षाओं व इच्छाओं का त्याग कर अपने प्रिय के लिये अपनी ज़िन्दगी को समर्पित करने से है।निश्चल मन से आत्मा की गहराई तक समर्पित हो जाना ही सच्चे प्यार की निशानी है।इस संसार में समर्पण अत्यन्त कठिन है जिसका कुछ विरले लोग ही पालन कर सकते हैं।समर्पण वही माना जाता है जो प्रतिदान में कुछ पाने की लालसा नहीं रखता है।जो व्यक्ति अपने जीवन साथी के लिये निस्वार्थ रूप से किसी भी हद में जाकर मुश्किलों का सामना करने के लिये तैयार रहते हैं वही सच्चे प्यार में समर्पण की भावना को परिभाषित करते हैं।

समर्पण की शक्ति

निस्वार्थ सेवा के लिये समर्पण की आवश्यकता

इस स्वार्थी व मतलबी दुनिया में अपने आप को समर्पित कर लोगों की सेवा करना भी किसी भगवान को किये गए समर्पण से कम नहीं है।मानव सेवा ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है,इसी विचार को इन्सान अपने में ढाल ले तो वह अपने कर्मों से समर्पण की तमाम ऊँचाइयों को छूकर नये आयाम स्थापित कर सकता है।श्रद्धा,त्याग व निस्वार्थ सेवा का नाम ही समर्पण है।सेवा के लिये उठने वाले हाथ, प्रार्थना करने वाले हाथों से हज़ार गुणा शक्तिशाली होते हैं।यही सेवा भावना का मूल मन्त्र है।

समर्पण की शक्ति

अपने आप को भगवान को समर्पित कर दें

समर्पण का अर्थ हार नहीं होता है।समर्पण तो अपनी हार को जीत में बदलने का सर्वोत्तम साधन है।समर्पण में इतनी अटूट श्रद्धा व आस्था छिपी हुई है की यह समर्पण करने वाले के साथ साथ समर्पण होने वाले को भी बदल कर रख देती है।ऐसी अटूट श्रद्धा केवल परम विश्वास की डोर से बँधे समर्पण में ही संभव है।जिस दिन आप संसार के बनाये नियमों से अपने आप को बेबस व असहाय महसूस करें,अपने आपको ईश्वर को समर्पित कर दें।इस भवसागर से बाहर निकलने में वही आपकी मदद कर सकता है और ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ़ समर्पण है। धन्यवाद व जय हिन्द

This Post Has One Comment

  1. PERMILA RANI

    आस्था और निःस्वार्थ प्रेम होने पर व्यक्ति स्वतः समर्पण के मार्ग को अपना कर आध्यात्मिक व शाश्वत सुख को प्राप्त कर सकता है।

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