मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम

श्रीराम का चरित्र वस्तुतः आदर्श धर्मात्मा का जीवन चरित्र है।वह बड़े ही प्रतापी, धर्मात्मा, प्रजापालक, निष्पाप व निष्कलंक थे।उनका व्यवहार व जीवन दर्शन ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है।उन्होंने अपने जीवन में तमाम मर्यादाओं का पालन किया और मानव जीवन में आदर्श व्यवहार की मर्यादाएँ स्थापित की।श्रीराम धर्म का साक्षात रूप थे।वह मन, वचन व कर्म से लोकधर्म और वेद मर्यादा का पालन करने वाले महापुरुष थे।सदाचार के प्रतीक श्रीराम का पूरा जीवन ही आदर्शों व संघर्षों से युक्त रहा है।जनमानस के समक्ष जीवन का जो आदर्श उन्होंने राजा के रूप में और आज्ञाकारी पुत्र के रूप में सबके सामने रखा और सबके प्रति स्नेह,करुणा और सेवा का भाव रखा,वह संपूर्ण समाज व मानव जाति के लिये अनुकरणीय है।

मानवीय मूल्यों की मर्यादा का प्रतिनिधित्व

हमारी संस्कृति में कोई ऐसा दूसरा चरित्र नहीं है जो श्रीराम के समान मर्यादित, धीर-वीर, न्यायप्रिय व प्रशान्त हो।इस विराट चरित्र वाले आदिपुरुष की कामना हर भारतीय संस्कृति व परिवार में की जाती है।श्रीराम के कार्य, व्यवहार, चरित्र व व्यक्तित्व से प्रभावित होकर प्रजा का प्रत्येक वर्ग उन्हें प्राणों से अधिक प्रेम करता था।जहाँ राज्याभिषेक के अवसर पर उनके मुख पर कोई प्रसन्नता नहीं थी वहीं वन में जाने व कठोर जीवन की आहट से उनके चेहरे पर कोई शोक की रेखाएँ नहीं थी।यह एक सच्चे महापुरुष की निशानी है, जो सम्पत्ति प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होते और विपत्ति आने पर दुखी नहीं होते हैं।प्रभु राम की राजनीति व अर्थनीति में ऊँच-नीच का कोई भाव न था।जो हीन दृष्टि से देखे जाते थे, राम ने उन्हें अपनाकर उनका सामाजिक अभिशाप धो दिया।शबरी, निषादराज व केवट इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।जाति प्रथा के आडंबर को तोड़ कर प्रभु राम ने समाज को हमेशा नई राह दिखायी है।राम के विचार दर्शन विस्तारवादी न होकर स्वयं में परिपूर्ण होते हैं।सत्ता या राज्य विस्तार का लोभ होता तो बाली वध के पश्चात या लंका पतन के बाद दोनो राज्यों में रघुकुल की पताका फहरा सकते थे पर प्रभु राम की नीतियाँ हमेशा मर्यादित व जीवन दर्शन का आदर्श प्रस्तुत करने वाली होती हैं।असाधारण होकर भी उन्होंने साधारण जीवन से समूचे लोक का नेतृत्व किया।राम चाहते तो सेना बुलाकर रावण का अन्त कर सकते थे लेकिन उन्होंने संगठन में शक्ति का भाव जगाकर सामान्य समाज को उनके साहस व कौशल से परिचित कराया।अत्यन्त पराक्रमी होने के बावजूद उन्होंने लंका विजय का श्रेय लक्ष्मण, वानरों व उनकी सेना को दिया।ऐसी हज़ारों ख़ूबियों से परिपूर्ण प्रभु राम के बिना भारतीय समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

भारतीय समाज में राम नाम की महिमा

भारत की संस्कृति व संस्कारों में यह दो अक्षर का नाम बड़ी गहराई से समाया हुआ है और जन जन के रोम रोम में बसा हुआ है।सुबह उठते ही नमस्कार के रूप में राम राम की ध्वनि से लेकर दिन भर में मिलने जुलने वालों से अभिवादन के रूप में राम नाम का शब्द एक नयी प्राणवायु का संचार करता है।राम नाम की इस महिमा से भव सागर को आसानी से पार किया जा सकता है।जीवन की अंतिम यात्रा में भी ‘राम नाम सत्य है’ से मानव जीवन दुखों से मुक्त होकर एक नये शरीर की प्राप्ति करता है।भगवान राम ने भारत के प्रत्येक जन के लिये एक संबल का काम किया है और उन्हें अंधेरो से उजाले की, अज्ञान से ज्ञान की व प्रेरणादायक जीवन जीने की राह दिखायी है।भारतीय संस्कृति में परिवार के प्रति उनके लगाव व त्याग की कहानियाँ जन जन को हमेशा से ही आनंदित व उत्साहित करती रहती हैं।राम सिर्फ़ दो अक्षर का नाम नहीं,राम तो प्रत्येक प्राणी में समाया हुआ है।श्रीराम के बिना भारतीय समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है।

रामराज्य की परिकल्पना

भगवान राम का जन्म व रामराज्य का उदगम क़रीब 10000 वर्ष पूर्व हुआ था।यह विश्व में अनोखा उदाहरण है की इतने वर्षों के बाद भी हम उनकी नीतियों व आदर्शों को याद कर रामराज्य की परिकल्पना कर रहे हैं और उन्हें अपने जीवन में ढालने का प्रयत्न करते रहते हैं। रामराज्य का अर्थ ही समस्त संसार में शान्ति व सुरक्षा की स्थापना करना व जाति, धर्म व सम्प्रदाय के भेदभाव को मिटाकर सभी के लिये एक उत्कृष्ट जीवन प्रदान करने से है,जिसकी आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।इसलिए आज समस्त संसार रामराज्य की कामना व अभिलाषा रखता है।इसके लिये ज़रूरी है की भारत का बच्चा बच्चा प्रभु राम के जीवन चरित्र से परिचित हो व अपने जीवन व व्यवहार में उन्हें आदर्श मानकर उनका अनुकरण करे।यही रामराज्य की परिकल्पना है।ऐसे उच्च कोटि के आदर्शो के कारण ही प्रभु राम जन जन के प्रिय हैं।प्रभु राम को हम कोटि कोटि प्रणाम करते हैं। जयश्री राम

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