आ अब लौट चलें

आ अब लौट चलें

आज मन बेचैन है, कुछ उदास है, एक बार फिर से अपनी माटी से जुड़ने के लिये बेताब है।बावरा मन उन्ही राहों पर फिर से चलना चाहता है जहाँ से ज़िन्दगी की शुरुआत की थी।ग़ैर जरुरी ख़्वाहिशों का बोझ लिये मैं निरन्तर चलता गया और पीछे छोड़ता गया अपनों का साथ।धीरे धीरे मैं सबसे दूर होता गया।ज़िन्दगी के इस मुक़ाम पर आकर पाया की पैसा कमाना ही सब कुछ नहीं है।अपनों को खोकर जीना भी कोई जीना है, इस बात का बड़ी शिद्दत से अहसास हो रहा है।पैसा कमाने की अंधी दौड़ में इस क़दर आगे निकल आयें हैं कि एकबारगी वापिस लौटना मुश्किल लग रहा है लेकिन मन में ठान लिया तो नामुमकिन भी नहीं है।सुबह का भूला शाम को घर वापिस आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते हैं, शायद यही सोच वापिस लौटने को प्रेरित कर रही है।

अपनों से जुड़ी उम्मीदें

अपने सपनों की उड़ान लिये घर से कितनी दूर आ पहुँचे हैं।एक अनजान अजनबी शहर में अपनों की तलाश करना मृग मरीचिका सरीखे हो गया है।घर में जो प्यार स्नेह से भरी लानत भी मिलती थी तो वो भी अपनी लगती थी।यहाँ तो हम किसी से प्यार के दो बोल सुनने के लिये भी तरस गये हैं।ज़िन्दगी की ढलती शाम में जब यह अहसास होगा कि अपनों से दूर रहकर पैसा तो ख़ूब कमाया लेकिन जीवन के वो हसीन पल खो दिये,जिन्हें किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता है।अपनों के अपनत्व का अहसास अब बड़ी शिद्दत से कचोट रहा है।इससे पहले की देर हो जाये, अपनों की विरासत से जुड़ने व उन्हें सारी ख़ुशियाँ लौटाने का समय आ गया है।

कैसे चुकायेंगे अपनों का ऋण

जिस माँ बाप ने अपनी सारी उम्र बच्चों की तमाम ख़ुशियों को पूरा करने में समर्पित कर दी, ख़ुद कष्ट सहकर तुम्हें समाज में रहने के क़ाबिल बनाया, आज उन्हें बुढ़ापे में तुम्हारे सहारे की सख़्त ज़रूरत है।माँ बाप के लिये बच्चे ही उनकी दुनिया होती है और वह उसी में अपने अतृप्त अरमानों व इच्छाओं को पूरा होते देखना चाहते हैं।वह अपना सब कुछ खोकर भी तुम्हें पाना चाहते हैं।तुम्हारी समस्त उम्मीदों को पूरा करने के पश्चात बस सम्मान के दो शब्दों को सुनना चाहते हैं।धन दौलत व प्रतिष्ठा कमाने के चक्कर में हमने परिवार व समाज के तमाम उन चाहने वालों को भुला दिया जिन्होंने हमसे कुछ उम्मीदें लगा रखी थी।दुनिया भर में घूमने के पश्चात भी वैसी ज़िन्दगी ढूँढने से भी नहीं मिली, जिस स्नेह, प्यार, अपनापन व वात्सल्य से भरी ज़िंदगी को यहाँ छोड़ गये थे।जिन्होंने हमें उँगली पकड़ कर चलना सिखाया, उनकी बाँह थामकर अपनी जड़ों में लौटने का वक़्त आ गया है।धन्यवाद व जय हिन्द

2 thoughts on “आ अब लौट चलें

  1. अपने लिए तो सभी जीते हैं अपनों के लिए जीना ही वास्तव में जीना है। जब जागो तभी सवेरा। बहुत सुंदर विचार है। हार्दिक
    शुभकामनाएँ।

  2. बड़ी कठिन यात्रा है लौटना,,
    लौटने पर कुछ नही मिलता पहले जैसा पर मन है सुकुन की तलाश में बार-बार लौटना चाहता है……

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